आखिर क्यों आज उसका चेहरा फिर से सामने आया , 

आखिर क्यों उसका ख्याल आज दिमाग मे आया , 

ए शाम की हँसी वादिया , तुझे चाँद की चांदनी की कसम की बोल दो उसे जाके,

मैंने जीना सीख लिया है , देर लगी लेकिन मैंने जीना सीख लिया है , 

 

वक्त लगा मुझे उठने मे , लेकिन मैं गिर कर भी उठ गया , 

ए शाम की हँसी वादिया, जाओ जाकर उनसे बोल दो की , 

मैं ठोकरों से गिरा था …. किसी की नजरो से नहीं …… 

थोड़ी ही देर सही…. लेकिन मैंने जीना तो सीख लिया है …..

 

वक़्त और ठोकरों से कुछ याद आया , 

उसकी यादे एक तेज ठोकर की जैसी है, जो वक़्त के साथ बदल जाएगी 

एक वक़्त ऐसा आएगा की, की वही ठोकर मेरे नए मंजिल की पहली सीड़ी नजर आएगी 

ए मेरे दोस्तों, कलेजा शेर का चाहिए ऐसी ठोकर को  मंजिल मे  बदलने के लिए , 

क्यों की मैंने जीना सीख लिया है …. मैंने जीना सीख लिया है ….. :) 

 

 

This poem is written by Adesh Saxena. Share this poem (Dil ki Aawaaj and Journey OF My Life) with your Friends.

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