गोवर्धन परिक्रमा का महात्म्य

संपूर्ण भारत में ब्रज भूमि एंव श्रेष्ठ माना गया है । श्री गोवर्धन का उल्लेख ,गर्ग संहिता , बारह पुराण श्रीमदभागवत और ब्रहम वैवर्त पूराण सहित अन्य ग्रंथों में उपलब्ध है ।

शास्त्रो के अनुसार सतयुग में श्री द्रोणाचल के पुत्र रूप में श्री गोवर्धन (गिरिराजजी ) ने जन्म लिया । गोवर्धन की सुनदरता देखकर पुलस्त्य मुनि मुग्ध हो गये । उन्होने द्रोणाचल से उनके पुत्र गोवर्धन को अपने साथ ले जाने आग्रह किया । द्रोणाचल ने महामुनि के श्राप के भय से मना तो नही किया अपितु इस बारे में स्वयं गोवर्धन से ही बात करने को कहा ।

तब महर्षि श्री पुलस्त्य ने गोवर्धन से कहा तुम मेरे साथ काशी ( बनारस ) चलो । में तुम्हे वहां स्थापित करके गंगतीर पर बैठकर तपस्या करूंगा । इस पर गैवर्धन ने कहा कि महामुनि में आपके साथ चलने को तो तैयार हूँ किंतु मेरी एक शर्त यह है कि आप मुझे मार्ग में कहीं रखेंगे नही और यदि रख देंगे तो फिर में उस स्थान से नही हटुंगा । तब महामुनि ने उस शर्त को स्वीकार करते हुए अपनी हथेली पर योग बल से श्री गोवर्धन को बैठाया और काशी की ओर चल दिये ।

चलते – चलते मार्ग में ब्रजभूमि आने पर गैवर्धन के मन में ऐसा विचार आया कि हे प्रभु ये मुझे यहीं छोड जाएं तो कितना अच्छा होगा । ततक्षण महामुनि को लघुशंका लगी और उन्होने गोवर्धन को धरा पर रख दिया । जब महामुनि पुलस्त्य जी लगुशंका करके आए तो उन्होने गोवर्धन से उठने को कहा तो गोवर्धन ने महामुनि को अपनी शर्त की याद दिलाई जिसमे यह कहा था कि आपने मझे मार्ग में कहीं रख दिया तो में वहां से फिर नहीं उठूंगा । इससे कुलपति पुलस्त्य मपनि ने गोवर्धन को श्राप दे दिया कि ज्यौ- ज्यौ कलयुग आता जायेगा तू तिल तिल (रत्ती- रत्ती ) करके घटता चला जायेगा ।

महामुनि के श्राप से गोवर्धन विचलित नहीं हुए । त्रेता युग में सेतुबंध के निर्माण के समय मर्यादा पुरूणोत्तम भगवान श्री राम की सहायता के लिये अंजनी पुत्र श्री हनुमान जी पर्वतों को बुलाने ब्रज में आये और उन्होने श्री गोवर्धन महाराज से श्री राम की मदद के लिये चलने को कहा । गोवर्धन तैयार हो गये , मगर तभी सेतुबंध का निर्माण पूरा होने का समाचार आ गया । साथ ही यह खबर भी आ गई कि कोई भी वानर अब किसी पर्वत के न लाये । तव तक हनुमान जी गोवर्धन को प्रभु श्री राम के दर्शन कराने का आश्वासन दे चुके थे । इस खबर को सुनकर वह दौडे – दौडे श्री राम के पास गये । उन्होने कहा कि प्रभु में ने पर्वतराज श्री गिरिराज जी को आपके (श्री राम ) दर्शन कराने का वचन दे दिया है । अत : अब आप ही इस संकट से उभारो ।

यह सुनकर भगवान श्री राम ने कहा हे हनुमान तुम श्री गिरिराज जी से कहो कि यदि वह यहां आते तो पर्वतों के बीच लग जाते और उन्हे आनेंद नही आता । अब वह यदि प्रतीक्षा करेंगे तो द्वापर युग में जब लीला पुरूषोत्तम कृष्ण बनकर ब्रजभूमि में आउंगा तो न केवल श्री गिरिराज जी को दर्शन दूंगा बल्कि उन्हे अपने कर (हस्त) पर धारण कर उन्हे अपना स्वरूप भी प्रदान करूंगा । द्वापर मे भगवान श्री कृष्ण का मथुरा (ब्रज ) में जन्म हुआ । कंस के भय से श्री वासुदेव बालक कृष्ण को नंन्द बाबा के घर नन्द गांव पहुंचा चुके थे । कृष्ण की सात वर्ष की आयु हो चुकी थी । कृष्ण की बाल लीलाओं से पूरा ब्रजमण्डल खासकर ब्रज की गोपियां उनकी दीवानी हो चुकी थी । ब्रज में उस समय तक राजा इन्द्र के देवतुल्य पूजते थे ।

नन्दबाबा सहित पूरा ब्रजमण्डल इन्द्र की पूजा अर्चना के लिए तैयारियां चल रही थी । इन तैयारियों में जुटा था । सुन्दर पकवानों की तैयारियां चल रही थी । इन तैयारियौ को देख बाल सुनभ लीलाओं से ब्रजवासियों को मोहने वाले कन्हैया ने नंदबाबा से पूछा कि बाबा यह किस समारोह का तैयारियां चल रही है । इस समारोह का उद्देश्य क्या है ? और इसके आयोजन से हमें क्या लाभ होगा ? िस पर नंदबाब ने कहा कि कन्हैया यह इन्द्र राजा के पूजा समारोह की तैयारिया है । इन्द्र हमारे राजा है । वह हमारे खेत खलिहान पशुधन के लिए वर्षा के जरिए जल देते है । इसमे हमें अन्नादि की प्राप्ति होती है । यह पूर्वजों द्वारा स्थापित मान्य पूजा है । तब कन्हैया ने कहा बाबा कर्म से आदमी जन्म लेता है और कर्मों से ही शरीर का त्याग करता है तथा सुख , दुख .भय और कल्याण कर्म से ही जीव को मिलते है।

कर्माणा जायते जन्तुं कर्म विलीयते ।
सुखं , दुखं , भयं क्षेमं , करमणैवामि पघतें ।।

ऐसे में इन्द्र क्या करेगा ? श्री कृष्ण ने नंद बाबा को समझाया बाबा ऋतुओं में बारिश होगी ही । इसमे इंद्र क्या करेगा फिर हम जो पकवान बना रहे है उन्हे खाने क्या इन्द्र पृथ्वी पर आयेगा । इस पर नंद बाबा ने कहा कि कन्हैया इन्द्र इसके लिये पृथ्वी पर कभी नही आते । तब कृष्ण ने कहा कि बाबा आप ही बताइये इनंद३ बनारे दावता कैसे है सकते है । बाबा हमारे देवता तो हमारी गाये , ब्रज की लता पत्रम, कुंज , यमुना और श्री गिरिराज जी महाराज है । अत हमें उन्ही की पूजा करनी चाहिये । और हां बाबा हमारे देवता तो स्वयं बूजा में शामिल होंगे और भैग भी स्वीकार करेंगे ।

तब बाबा ने पूछा लाला कहां है तेरा देवता ? तो श्री कृष्ण ने गिरिराज जी की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह है हमारे देवता । नंनद बाबा के बडे भाई उपमंद ने इस पर अपने लाला ( श्री कृष्ण ) का यह कहते हुए पक्ष लिया कि नंद इंद्र को तो हम हर साल पूजते ही हे क्यों न इस बार बम अपने लाला का कहा मान ले । और इस तरह नंद बाबा सहित सारा ब्रज श्री गोबर्धन ( श्री गिरिराज जी ) महाराज की पूजा की तैयारियों में जुट गाया । बताया जाता हा कि जिस समय नंद बाबा और भगवान श्री कृष्ण के बीच श्री संबाद चल रहा था ।

अचानक देवर्षि नारद वहां पहुंच गये और नंद बाबा के घर जाने की जगह ठिठक कर इस संवाद को सुनने लगे जैसे ही यह संवाद पूरा हुआ उल्टे पैर तौटकर साधे इंद्र लेक में गये जैसे ही यह वहां उदास बैठे इंद्र को सारा वृतांत समला दिया । ब्रिजजवासियों द्वारा उनकी जगह श्री गोवर्धन की पूजा का समाचार सुनते ही इमद्र को क्रध आ गया और आकाश में भीषण गर्जना शुरू हो गई । दूसरी तरउ ब्रजवासियो द्वारा ने अपने लाला (श्री कृष्ण ) के कहे अनुसार गोवर्ङन महाराज की पूजा शुरू कर दी ।

श्री गोवर्धन महाराज को पहले गंगाजल से स्नान कराया फिर दूध , दही , घी , शहद और बूरे के पंचामृत से अङिषेक क्या । इसके बाद ब्रजवासियों द्वारा बनाये नाना प्रकार के ५६ व्यंजनों का भोग लगाया । भोग के बाद सभी ने मिलकार श्री गोवर्धन महाराज की परिक्रमा की । इधर अपने तिरस्कार से बौखलाये इंद्र ने ब्रजवासियोम को सवक सिखाने के लिए भ्रज में घमघोर वर्षे शुरू कर दी । इससे पूरा ब्रज जल मग्न गो गया , मगर वर्षा थी कि थमने का नाम नही ले रही थी । तब लीलाधाकी श्री कृष्ण ने अपनी तर्जनी पर श्री गोवर्धन महाराज को उठाकर ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया । इद्र ने पूरे सात जिन ब्रजमण्डल में वर्षा का ताण्डव किया और श्री कृष्ण सात दिनों तक श्री गोवर्धन को अपनी तर्जनी उंगली पर धारण करे रहा ।

इस तरह इंद्र का घमण्ड चूच – चूर हो गया । इंद्र को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने लीला धारी श्री कृष्ण के शारणागत गो अपनी धृष्टता के लिये क्षमा मांगी । इस तरह श्री गोवर्धन महाराज की पूजा का विधान शुरू हुआ जो अब तक अनवरत जारी है ।

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